हिंदी साहित्य इतिहास की लेखन पद्धतियां व इतिहास ग्रंथ, काल विभाजन
भाग 1: हिंदी साहित्य इतिहास लेखन की पद्धतियाँ (Methodologies)
इतिहासकारों ने साहित्य के इतिहास को व्यवस्थित करने के लिए मुख्य रूप से चार पद्धतियों का प्रयोग किया है:
1. वर्णानुक्रम पद्धति (Alphabetical Method):
इसमें कवियों और लेखकों का विवरण उनके नाम के प्रथम वर्ण (अक्षर) के क्रम से दिया जाता है, चाहे उनका समय कोई भी हो (जैसे- कबीर और केशवदास का विवरण एक साथ)।
इसे 'इतिहास' न कहकर केवल 'कवि-वृत्त संग्रह' कहा जाता है।
प्रयोगकर्ता: गार्स द तासी और शिवसिंह सेंगर।
2. कालानुक्रम पद्धति (Chronological Method):
इसमें कवियों का वर्गीकरण उनकी जन्म तिथि या ऐतिहासिक समय (काल) के आधार पर किया जाता है।
प्रयोगकर्ता: जॉर्ज ग्रियर्सन और मिश्रबंधु।
3. वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method):
इसमें इतिहासकार पूरी तरह तटस्थ और निरपेक्ष रहकर केवल तथ्यों का संकलन करता है और उन्हें क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें व्याख्या और विश्लेषण का अभाव होता है।
प्रयोगकर्ता: डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त।
4. विधेयवादी पद्धति (Positivistic Method) - [सर्वश्रेष्ठ पद्धति]:
इसके जन्मदाता फ्रांस के विद्वान 'तेन' (Taine) माने जाते हैं। उन्होंने इसके तीन तत्व बताए: जाति (Race), वातावरण (Milieu) और क्षण-विशेष (Moment)।
इस पद्धति में साहित्य को वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब मानकर युगीन परिस्थितियों के संदर्भ में परखा जाता है।
प्रयोगकर्ता: आचार्य रामचंद्र शुक्ल (हिंदी में सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ प्रयोग)।
भाग 2: इतिहास लेखन के प्रमुख ग्रंथ (मोस्ट इम्पोर्टेन्ट वन-लाइनर तथ्य)
इस्तवार द ल लितरेत्यूर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी: यह हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास ग्रंथ है, जो फ्रेंच भाषा में लिखा गया। इसके लेखक गार्स द तासी हैं। इसका प्रथम भाग 1839 ई. और दूसरा भाग 1847 ई. में प्रकाशित हुआ था।
तज़किरा-इ-शुआरा-इ-हिन्दी: 1848 ई. में मौलवी करीमुद्दीन द्वारा रचित इस ग्रंथ में पहली बार कालक्रम का थोड़ा ध्यान रखा गया, इसमें कुल 1004 कवियों में से 62 कवि हिंदी के थे।
शिवसिंह सरोज: 1883 ई. में शिवसिंह सेंगर द्वारा रचित। यह हिंदी भाषा में लिखा गया पहला इतिहास ग्रंथ है, जिसमें लगभग 1000 (998) कवियों का विवरण है।
द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान: 1888 ई. में जॉर्ज ग्रियर्सन द्वारा रचित। इसे सच्चे अर्थों में हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास ग्रंथ माना जाता है। ग्रियर्सन ने ही सर्वप्रथम कवियों का कालक्रमानुसार वर्गीकरण किया और उनकी प्रवृत्तियों को स्पष्ट किया।
मिश्रबंधु विनोद: यह मिश्रबंधुओं (गणेशबिहारी, श्यामबिहारी और शुकदेवबिहारी) द्वारा रचित एक विशाल ग्रंथ है। इसके प्रथम तीन भाग 1913 ई. में और चौथा भाग 1934 ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें लगभग 5000 (4591) कवियों को स्थान दिया गया है।
हिंदी साहित्य का इतिहास (1929 ई.): आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा रचित यह हिंदी का सबसे प्रामाणिक और मील का पत्थर ग्रंथ है। यह मूलतः नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित 'हिंदी शब्दसागर' की भूमिका के रूप में 'हिंदी साहित्य का विकास' नाम से लिखा गया था।
भाग 3: काल-विभाजन और नामकरण (Periodization & Nomenclature)
विभिन्न विद्वानों द्वारा किए गए काल-विभाजन और उनके द्वारा दिए गए नाम निम्नलिखित हैं, जहाँ से कूट (Codes) वाले प्रश्न बनते हैं:
आदिकाल के विभिन्न नाम और प्रयोक्ता (परीक्षा के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण):
चारण काल ➔ जॉर्ज ग्रियर्सन (सर्वप्रथम काल-विभाजन का प्रयास)
आरंभिक काल ➔ मिश्रबंधु
वीरगाथा काल ➔ आचार्य रामचंद्र शुक्ल (12 प्रामाणिक रचनाओं के आधार पर)
आदिकाल ➔ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (सर्वमान्य नाम)
सिद्ध-सामंत काल ➔ राहुल सांकृत्यायन
बीजवपन काल ➔ आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी
संधि काल एवं चारण काल ➔ डॉ. रामकुमार वर्मा
वीर काल ➔ आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
आधार काल ➔ सुमन राजे और मोहन अवस्थी
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का काल-विभाजन (संवत में):
शुक्ल जी का काल-विभाजन दोहरा नामकरण और प्रधान प्रवृत्ति पर आधारित है, जो सर्वप्रचलित है:
आदिकाल (वीरगाथा काल) ➔ संवत् 1050 से 1375 (993 ई. से 1318 ई.)
पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) ➔ संवत् 1375 से 1700 (1318 ई. से 1643 ई.)
उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) ➔ संवत् 1700 से 1900 (1643 ई. से 1843 ई.)
आधुनिक काल (गद्य काल) ➔ संवत् 1900 से 1984 (1843 ई. से 1927 ई.) (नोट: संवत् में से 57 वर्ष घटाने पर ईस्वी सन प्राप्त होता है।)
⭐ रीतिकाल का नामकरण:
अलंकृत काल ➔ मिश्रबंधु
रीतिकाल ➔ आचार्य रामचंद्र शुक्ल
शृंगार काल ➔ आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (इन्होंने रीतिकाल को तीन भागों में बांटा: रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त)
कला काल ➔ डॉ. रमाशंकर शुक्ल 'रसाल'
⭐ आधुनिक काल का नामकरण और उप-विभाजन (डॉ. नगेंद्र के अनुसार):
डॉ. नगेंद्र ने आधुनिक काल का विभाजन प्रवृत्तियों के आधार पर इस प्रकार किया:
पुनर्जागरण काल (भारतेन्दु काल) ➔ 1857 ई. से 1900 ई.
जागरण-सुधार काल (द्विवेदी काल) ➔ 1900 ई. से 1918 ई.
छायावाद काल ➔ 1918 ई. से 1938 ई.
छायावादोत्तर काल:
प्रगतिवाद - प्रयोगवाद काल ➔ 1938 ई. से 1953 ई.
नवलेखन काल (नई कविता) ➔ 1953 ई. से अब तक।
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